मुद्दा व्यापमं घोटाला, पुलिस का परमानेंट गवाह

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नर्ई दिल्ली : कविता रैना हत्याकांड हो या चर्चित व्यापमं घोटाला। सभी बड़े और गंभीर मामलों में सिराज अब्देअली नामक फर्जी गवाह का नाम सामने आया है। वह अभी तक सैकड़ों मामलों में गवाही दे चुका है। इसका ज्यादातर वक्त कोर्ट और थानों में गुजरता है। कई मामलों में पुलिस खुद सेटिंग कर बयान बदलवा देती है। जिन मामलों में सेटिंग नहीं होती उनके खिलाफ बयान भी करवा देती है। सिराज अब्देअली वह शख्स है जिसे सिपाही से लेकर कोर्ट कर्मचारी भी पहचानते हैं। सैंकड़ों केसों में गवाह बन चुका सिराज कुछ दिनों पूर्व कविता रैना हत्याकांड में गवाही देने कोर्ट पहुंचा तो वकील दंग रह गए कि आखिर पुलिस का परमानेंट गवाह इस गंभीर मामले में कैसे शामिल हो गया। केस डायरी में उसका नाम तीन जगह दर्ज था। सिराज अमूमन रुपए लेकर गवाही से पलट जाता है लेकिन जिस मामले में सेटिंग नहीं होती उसमें खिलाफ भी बयान देता है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। पुलिस खुद लेकर आई और रटे-रटाए बयान करवाए।
पुलिस ने बताया कविता के हत्यारे महेश बैरागी ने नौलखा पार्किंग में एक्टिवा रखी थी। इसमें सिराज को चश्मदीद गवाह बताया। इसके बाद तीन अलग-अलग तारीखों पर किराया चिट्ठी जब्त करना दर्शाई। ताज्जुब इस बात का है कि सभी में सिराज को गवाह बनाया गया।
व्यापमं घोटाले में भी सिराज गवाह
राजेंद्र नगर थाने में अ.क्र.539/13 में भी सिराज गवाह है। जांच में शामिल दो टीआई-दो एसआई 18 अप्रैल को मुख्य आरोपी नितिन महिंद्रा से हार्ड डिस्क जब्त करने रवाना हुए। मेमोरंडम पर सिराज और राहुल मराठा को गवाह बनाया गया। राहुल सिराज का साथी है और सिराज की तरह वह भी पॉकेट गवाह है।
ऐसे चलता है गवाही का धंधा
सिराज राजेंद्र नगर, जूनी इंदौर और चंदन नगर थाने का ‘पॉकेट’ गवाह है। कई मामलों में सिराज को खुद पता नहीं रहता कि उसे केस में गवाह बना दिया। कोर्ट से समंस और वारंट जारी होने पर वह आरोपी-फरियादी से मिलता है। कोर्ट के बाहर सेटिंग हो गई तो बयान पलट देता है। सेटिंग नहीं हुई तो उनके खिलाफ बयान देता है। रेट भी केस के हिसाब से तय हैं। अवैध हथियार और अवैध शराब के मामले में 500 और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर केस में 50 हजार तक वसूल लेता है।
चायवाले और मुखबिर भी गवाह
कनाड़िया थाने के बाहर चाय का ठेला लगाने वाला राजू और एरोड्रम का मुनीम भी परमामेंट गवाहों में शामिल हैं। इन्हें तो कोर्ट से समंस तामील होने पर केस का पता चलता है। इसी तरह लखन तंवर, लखन गौर, रघुवीर पौहरा, रणवीर, सुरेश माघरे, संजय, धीरज, वकील सिंह, रामलाल, रामसिंह, धरमू, रमेश, महादेव, राजेश, गंगाचरण, अजय पथरोड, राजू दीनानाथ, सुबोध पांडे, बाबू खां, सत्तार, मिट्टूलाल, रामप्रसाद, रतनलाल, रमाकांत, जसवंत, नवाब खान, किशोर, नारायण, रुमाब, छगन, भेरु, गणेश, छीतू, हीरालाल, अनिल, भीमसिंह, रामचंद्र, शंकरलाल, विनोद, कुंवरलाल भी पुलिस के पॉकेट गवाह हैं।
तब भी की थी समीक्षा
तत्कालीन डीआईजी संतोषकुमार सिंह ने भी जून 2015 में 40 से ज्यादा पॉकेट गवाहों को चिन्हित करवाया था और इसकी समीक्षा भी की जा रही थी, ताकि आगे से ऐसे गवाहों का इस्तेमाल ना हो। कुछ दिनों तक ये ठीक रहा, लेकिन फिर थाना प्रभारियों ने पॉकेट गवाहों को कोर्ट में उतारना शुरू कर दिया।
हर मामले में पुलिस को निष्पक्ष एवं स्वतंत्र गवाहों को ही रखना चाहिए। गंभीर मामलों में गवाह बनाते वक्त विशेष ध्यान रखना चाहिए, कि ऐसा कतई ना हो कि वे पॉकेट गवाह हों। अगर पॉकेट विटनेस बनाए गए हैं और रुपए लेकर पक्षद्रोही होते हैं तो उनकी समीक्षा की जाएगी। -हरिनारायणचारी मिश्र, डीआईजी इंदौर
कोटेशन
सेटिंग नहीं हुई तो उनके खिलाफ बयान देता है। रेट भी केस के हिसाब से तय हैं। अवैध हथियार और अवैध शराब के मामले में 500 और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर केस में 50 हजार तक वसूल लेता है।

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