तीन तलाक पर केरल हाई कोर्ट का जजमेंट लॉ कमिशन के सामने

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ट्रिपल तलाक के मामले में मुस्लिम महिलाओं के साथ न्याय के लिए उठ रही आवाजों के बीच लॉ कमिशन इसी मुद्दे पर केरल हाई कोर्ट के एक फैसले की समीक्षा कर रहा है। यह फैसला एक मुस्लिम जज ने सुनाया था। इस जजमेंट में ट्रिपल तलाक की प्रथा की कड़ी निंदा की गई है और इस बात पर जोर दिया गया है कि विधायिका के लोग मुस्लिम महिलाओं के साथ न्यायपूर्ण बर्ताव सुनिश्चित करें। जज जस्टिस मुश्ताक अहमद के निर्देश पर इस जजमेंट को हाल में केरल हाई कोर्ट ने लॉ मिनस्ट्री और लॉ कमिशन के पास भेजा था ताकि इस पर वे विचार कर सकें। लॉ कमिशन को ट्रिपल तलाक के मुद्दे के साथ यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने से जुड़ी स्थिति पर विचार करने का जिम्मा दिया गया है। कमिशन जस्टिस मुश्ताक के जजमेंट का अध्ययन कर रहा है। कमिशन के एक सीनियर अधिकारी ने बताया, जजमेंट में मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने और तलाक के कानून को संहिताबद्ध करने के पक्ष में दलील दी गई है। उन्होंने बताया कि कमिशन ट्रिपल तलाक पर अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देते वक्त जस्टिस मुश्ताक के जजमेंट का सहारा ले सकता है। अभी कमिशन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है कि वह ग्रीष्मावकाश में ट्रिपल तलाक को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि उसके पास मुस्लिम पर्सनल लॉ को लागू करने का ‘संवैधानिक’ अधिकार है। बोर्ड ने पिछले सप्ताह लॉ कमिशन के साथ अपनी पहली बैठक में दावा किया था कि उसके पास ऐसी मुस्लिम महिलाओं के चार करोड़ दस्तखत हैं, जो शरिया कानूनों के पक्ष में हैं। 60 पेज के जजमेंट में जस्टिस मुश्ताक ने कहा था कि मुस्लिम महिलाओं के लिए इन्साफ एक छलावा बन गया है। इस समस्या का हल तलाक के कानून को संहिताबद्ध करने में है।’ जज ने कहा था, कानून बनाने वालों को विधायी प्रक्रिया के जरिए तलाक से जुड़ा कानून बनाना चाहिए। जजमेंट में कहा गया था, राज्य ने कानून के सामने मयार्दा के वादे का सम्मान करने के लिए प्रतिबद्धता जताई है और यह धर्म के नाम पर मुस्लिम महिलाओं को पेश आने वाली परेशानियों का मूकदर्शक बनकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता है। ट्रिपल तलाक को रेगुलेट करने के लिए कानून बनाने की जरूरत पर जोर देते हुए जज ने कहा था, एक बार में तीन तलाक को कुरान में कहीं भी जायज नहीं ठहराया गया है और दूसरी ओर कुरान वैवाहिक विवाद का हल निकालने के लिए सबसे अच्छे तरीके के रूप में बातचीत को बढ़ावा देता है। यूनिफॉर्म सिविल कोड के विषय में कोर्ट ने कहा था, कॉमन सिविल कोड की जरूरत पर विभिन्न स्तरों पर चर्चा हो रही है, लेकिन विभिन्न समूहों में इस पर अब भी सहमति नहीं बन पाई है। इसके बावजूद भारत में कम से कम वैवाहिक कानूनों के लिए एक कॉमन कोड बनाना संभव है। कुरान में लिखी बातों का हवाला देते हुए जज ने कहा था, इस मामले पर संहिताबद्ध कानून बनाने पर विचार राज्य को करना है। लिहाजा भारत में मुस्लिम समुदाय के तलाक से जुड़े कानून में किसी भी रिफॉर्म का विरोध करने वालों का ध्यान कुरान ए पाक में कही गई बातों की ओर दिलाना चाहता हूं।
कोटेशन
जज जस्टिस मुश्ताक अहमद के निर्देश पर इस जजमेंट को हाल में केरल हाई कोर्ट ने लॉ मिनस्ट्री और लॉ कमिशन के पास भेजा था ताकि इस पर वे विचार कर सकें।

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