राजनीति से प्रेरित था अवार्ड वापसी अभियान

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साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा है कि 2015 में 50 से ज्यादा लेखकों और शायरों ने जो अवार्ड वापस किए थे, वो राजनीति से प्रेरित थे। तिवारी ने कहा है कि उनके पास इस बात के सबूत हैं कि ये अभियान खुद से शुरू नहीं हुआ था बल्कि एक योजना के तहत शुरू किया गया था और इसका मकसद सरकार को बदनाम करना था। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने एक लेख में इन बातों का जिक्र किया है। 2015 में देश में 50 से ज्यादा लेखकों और शायरों ने ये देश में असहिष्णुता बढ़ने की बात कहते हुए अपने सम्मान सरकार को लौटा दिए थे।

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा है कि 2015 में हुए इस अवार्ड वापसी अभियान का मकसद बिहार के विधानसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार को बदनाम करना था। तिवारी का दावा है कि इस अभियान के पीछे लेखक और कवि अशोक वाजपेई का दिमाग था और उन्होंने ही 50 से ज्यादा साहित्यकारों से पुरस्कार वापस कराए।

तिवारी ने अपने लेख में कहा है कि मेरे पास सबूत है कि अवार्ड वापसी स्वतःस्फूर्त नहीं था और इसे पांच लेखकों ने योजना बनाकर शुरू किया था। इसमें से कई ऐसे हैं जो पीएम मोदी के सत्ता में आने के पहले से ही उनके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रहे थे और 2015 में बिहार में भाजपा की हार पर भी इन्होंने जश्न मनाया था।

वहीं, अशोक वाजपेई ने विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के इन दावों को बिल्कुल तथ्यहीन बताया है। इकोनॉमिक्स टाइम्स से बातचीत में उन्होंने कहा कि तिवारी पता नहीं किस आधार पर ये बात कह रहे हैं। वाजपेई कहा कि जिन लोगों ने पुरस्कार वापस किए, उनमें से ज्यादातर एक दूसरे को जानते तक नहीं थे, ऐसे में इसके पीछे किसी योजना का कोई सवाल ही नहीं उठता है। पुरस्कार इसलिए वापस किए गए क्योंकि हालात लेखकों से एकजुटता की मांग कर रहे थे। ऐसे में एक-दूसरे के साथ एकजुटता के लिए लेखकों ने अपने पुरस्कार वापस किए।

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